पैंटोग्राफ उठाए चल पड़ी मेरी रेल,
सुंदर सोनी मेरी, ना कोई इसका दूजा मेल।
विशाल रूप इसका, है भारत का जीवनाधार,
सार्वजनिक प्रशंसा इसकी बन जाता मेरा अलंकार।
मैं हूं रेल की नारी, सदा दिया मैंने इसका साथ,
रेल तथा उसकी कर्मियों के कल्याण में बटाया पूरा हाथ।
अब आया समय मेरे जाने का, लो में चल पड़ी,
सफलता की श्रंखला में तुम जोड़ना नित्य एक नई कड़ी।
दिल की तुम जान हो, दिल की पहचान हो,
रेल का सम्मान हो, रेल का अभिमान हो।
बिन त्याग तुम्हारे चल नहीं सकती रेल,
साथ न दिया तुमने जो इसका, हो जाएंगे इसके सिग्नल फेल।
जा रही हूं मैं, फिर एक बार यह कहके,
मिट जाएगी यह विरासत, जो तेरे पैर लहके।
जो तेरे पैर लहके.....

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